1. बल की सहज अवधारणा
(Intutive Concept of Force)
स्थिर वस्तु को चलाने के लिए, चलती हुई वस्तु को रोकने के • लिए या उसकी गति को तेज या धीमी करने के लिए, गति की दिशा को बदलने के लिए, किसी वस्तु के आकार या आकृति में परिवर्तन करने के लिए हमें कुछ प्रयास (Effort) करना पड़ता है जिसे बल कहते हैं। यह बल धक्का या खिंचाव (Push or Pull) के रूप में होता है।
अतः बल वह धक्का या खिंचाव है जो किसी वस्तु की विरामावस्था में या गत्यावस्था में या गति की दिशा में या वस्तु के आकार या आकृति में परिवर्तन कर देता है या परिवर्तन करने का प्रयास करता है।
कई बार ऐसा होता है कि हम वस्तु पर बल तो लगाते हैं किन्तु उसकी स्थिति या अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं कर पाते हैं। जैसे-चट्टान को उसके स्थान से सरका पाना, बड़े पेड़ को हिला पाना, दीवार को उसके स्थान से हटा पाना कठिन कार्य होता है। इन सभी स्थितियों में यद्यपि बल लगाया जाता है किन्तु उनकी स्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं होता है। सामान्यतः बल के निम्न प्रभाव दिखलाई पड़ते हैं-
(i) बल विरामावस्था की वस्तु को गत्यावस्था में ला देता है या लाने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, जब मैदान पर रखी गेंद को मारा जाता है तो वह मैदान पर लुढ़कने लगती है, नाव को खेने पर वह पानी में चलने लगती है, साइकिल के पहिये पर पैडिल के द्वारा बल लगाने पर वह घूमने लगता है, आदि।
(ii) बल गत्यावस्था में परिवर्तन कर देता है या परिवर्तन करने का प्रयास करता है। जैसे-चलती हुई साइकिल पर ब्रेक लगाने से वह रुक जाती है, कार पर त्वरक द्वारा बल लगाने से उसकी गति धीमी या तेज हो जाती है, पेड़ से नीचे गिरते हुए फल को हाथ से पकड़कर रोका जा सकता है, आदि।
(iii) बल गति की दिशा को बदल देता है या बदलने का प्रयास करता है। जैसे—रस्सी के एक सिरे पर पत्थर के टुकड़े को बाँधकर दूसरे सिरे को हाथ से पकड़कर घुमाने पर पत्थर का टुकड़ा वृत्तीय मार्ग में गति करने लगता है, साइकिल के हैण्डिल को घुमाने से उसकी गति की दिशा बदल जाती है, पैडिल पर विपरीत दिशा में बल लगाने पर साइकिल के पहिये के घूमने की दिशा बदल जाती है आदि।
(iv) बल किसी वस्तु की आकृति या आकार में परिवर्तन कर देता है अथवा परिवर्तन करने का प्रयास करता है। जैसे- छत से लटकते हुए तार पर भार लटकाने पर उसकी लम्बाई बढ़ जाती है, गेंद को दबाने से वह पिचक जाती है, आदि।
बल किसी बाह्य साधन की सहायता से लगाया जाता है। जब बाह्य साधन वस्तु के सम्र्पक में होता है तो लगाये गये बल को सम्पर्क बल कहते हैं। हाथ से किसी वस्तु को खींचने के लिए लगाया गया बल सम्पर्क बल होता है। जब बाह्य साधन वस्तु के सम्पर्क में नहीं होता है, तो लगाये गये बल को असम्पर्क बल कहते हैं। पृथ्वी द्वारा किसी वस्तु पर दूर से लगाया गया गुरुत्वाकर्षण बल, चुम्बक द्वारा लोहे की कीलों पर दूर से लगाया गया आकर्षण बल आदि असम्पर्क बल के उदाहरण हैं।
2. जड़त्व
(Inertia)
साधारण अनुभव की बात है कि किसी कमरे में रखी हुई वस्तुएँ जैसे- पुस्तक, कुर्सी, टेबल, पलंग आदि उस कमरे में तब तक पड़ी रहेंगी जब तक कि कोई व्यक्ति उन्हें उठाकर अन्य स्थानों पर नहीं रख देता। ये वस्तुएँ स्वतः ही अपनी स्थिति में परिवर्तन करने में असमर्थ होती हैं। फर्श पर लुढ़कती हुई गेंद कुछ दूरी तय करके रुक जाती है, क्योंकि फर्श और गेंद के बीच कार्य करने वाला घर्षण बल गेंद की गति का विरोध करता है।
कल्पना कीजिए कि फर्श और गेंद के बीच अगर कोई घर्षण बल कार्य नहीं करता, इस स्थिति में गेंद एकसमान वेग से फर्श पर लुढ़कती रहती। स्पष्ट है कि एकसमान वेग से गति करती हुई गेंद अपने वेग में परिवर्तन करने में असमर्थ है। इस प्रकार प्रत्येक वस्तु स्वतः ही अपनी स्थिति या अवस्था में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है। वस्तु के इस गुण को ही जड़त्व कहते हैं।
किसी वस्तु में अन्तर्निहित वह गुण, जिसके कारण वह स्वतः ही अपनी विरामावस्था अथवा एकसमान गति की अवस्था में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है, उसका जड़त्व कहलाता है।
गैलीलियो (Galileo) के पूर्व यह मान्यता थी कि यदि कोई वस्तु एकसमान वेग से चल रही है तो उसके वेग को एकसमान बनाये रखने के लिए बल की आवश्यकता होती है, किन्तु गैलीलियो ने नत समतलों (Inclined planes) के प्रयोगों द्वारा सर्वप्रथम सिद्ध किया कि यदि कोई वस्तु एकसमान वेग से चल रही है तो उसके वेग को एकसमान बनाये रखने के लिए बाह्य बल की कोई आवश्यकता नहीं होती।
गैलीलियो के अनुसार, जो वस्तु स्थिर है वह स्थिर ही रहेगी जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल न लगाया जाये तथा जो वस्तु एकसमान वेग से चल रही है, वह उसी वेग से चलती ही रहेगी जब तक कि उस पर कोई बाह्य बल न लगाया जाए। इसे गैलीलियो का जड़त्व का नियम कहते हैं।
जड़त्व की माप - किसी वस्तु जड़त्व की माप उसके द्रव्यमान से की जाती है, जिस वस्तु का द्रव्यमान अधिक होता है, उसका जड़त्व भी अधिक होता है। उदाहरण के लिए, एक स्थिर ट्रक को, स्थिर कार की तुलना में चलाने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। अत: कार की तुलना में ट्रक का जड़त्व अधिक है। इस प्रकार किसी वस्तु का द्रव्यमान उसके जड़त्व की माप होती है।
जड़त्व और द्रव्यमान के मात्रक समान हैं। $ 3(A) 3. जड़त्व के प्रकार (Kinds of Inertia)
जड़त्व तीन प्रकार के होते हैं-
(1) विराम का जड़त्व, (2) गति का जड़त्व और (3) दिशा का
जड़त्व |
(1) विराम का जड़त्व (Inertia of rest) - किसी वस्तु के उस गुण को जिसके कारण वह स्वतः ही अपनी विराम की अवस्था में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है, विराम का जड़त्व कहते हैं।
अथवा
किसी वस्तु की उस प्रवृत्ति को जिसके कारण वह विरामावस्था में ही रहना चाहती है, विराम का जड़त्व कहते हैं ।
उदाहरण- (i) बस के एकाएक चलने पर उसमें बैठा व्यक्ति पीछे की ओर गिर जाता है। बस के एकाएक चलने पर व्यक्ति के कमर के नीचे का भाग बस के साथ गत्यावस्था में आ जाता है, किन्तु ऊपर का भाग विराम के जड़त्व के कारण विरामावस्था में ही रहता है। अतः व्यक्ति पीछे की ओर गिर जाता है।
(ii) घोड़े के एकाएक चलने पर उस पर बैठा घुड़सवार पीछे की ओर गिर पड़ता है।
(iii) कम्बल को छड़ी से पीटने पर या हाथ से झटका देने पर उसमें लगे धूल के कण गिरने लगते हैं। कम्बल के जिस भाग पर छड़ी पड़ती है, वे भाग गत्यावस्था में आ जाते हैं जबकि धूल के कण विराम के जड़त्व के कारण विरामावस्था में ही रह जाते हैं। अतः नीचे गिर जाते हैं।
इसी प्रकार जब कम्बल को हाथ से झटका जाता है तो कम्बल के विभिन्न कण गत्यावस्था में आ जाते हैं, किन्तु धूल के कण विराम के जड़त्व के कारण विराम में ही रहते हैं। अतः नीचे गिर जाते हैं।
(iv) पेड़ को हिलाने पर उसमें लगे पके फल टूटकर नीचे गिर जाते हैं। पेड़ को हिलाने पर उसकी डालियाँ गत्यावस्था में आ जाती हैं, किन्तु फल विराम के जड़त्व के कारण विरामावस्था में ही रह जाते हैं। अत: पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे गिर जाते हैं।
(v) जब तीव्र वेग से गतिमान बंदूक की गोली खिड़की के काँच से टकराती है तो काँच में स्पष्ट छेद हो जाता है, किन्तु जब पत्थर काँच से टकराता है तो काँच के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। जब तीव्र वेग से गतिमान गोली खिड़की के काँच से टकराती है तो काँच का केवल वह भाग गतिमान होता है जहाँ गोली टकराती है। शेष भाग विराम के जड़त्व के कारण विरामावस्था में रहते हैं। अत: काँच में स्पष्ट छेद हो जाता है। इसके विपरीत जब पत्थर कम वेग से काँच से टकराता है तो काँच के सम्पूर्ण भाग को वेग के कुछ अंश प्राप्त होने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। अत: काँच के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।
(vi) यदि गिलास के मुँह पर कार्ड रखकर उस पर सिक्का रखा जाये और कार्ड को तेजी से हाथ की उँगली से धक्का दिया जाये तो कार्ड आगे चला जाता है और सिक्का गिलास में गिर जाता है। कार्ड को उँगली से धक्का देने पर कार्ड गतिमान होकर आगे बढ़ जाता है, किन्तु सिक्का विराम के जड़त्व के कारण विरामावस्था में ही रहता है। अतः गिलास में गिर जाता
(2) गति का जड़त्व (Inertia of motion)- किसी वस्तु के उस गुण को जिसके कारण वह स्वतः ही सरल रेखा में अपनी एकसमान गति में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है, गति का जड़त्व कहते हैं।
अथवा
किसी वस्तु की उस प्रवृत्ति को जिसके कारण वह सरल रेखा में एकसमान गति में रहना चाहती है, गति का जड़त्व कहते हैं।
उदाहरण- (i) चलती हुई बस को एकाएक रोकने पर उसमें बैठा यात्री आगे की ओर झुक जाता है। जब बस को एकाएक रोका जाता है तो बस के साथ यात्री के कमर के नीचे का भाग विरामावस्था में आ जाता है, किन्तु ऊपर का भाग गति के जड़त्व के कारण गत्यावस्था में ही बना रहता है। अतः यात्री आगे की ओर झुक जाता है।
(ii) घोड़े के एकाएक रुक जाने पर उसमें बैठा घुड़सवार आगे की ओर गिर जाता है। घोड़े के एकाएक रुक जाने पर घुड़सवार के कमर के नीचे का भाग विरामावस्था में आ जाता है, किन्तु ऊपर का भाग गति के जड़त्व के कारण गत्यावस्था में ही बना रहता है। अतः घुड़सवार आगे की ओर झुक जाता है।
(iii) जब कोई व्यक्ति चलती हुई बस से उतरता है तो वह बस की दिशा में गिर जाता है। जब चलती हुई बस से उतरने वाला व्यक्ति जमीन पर पैर रखता है तो पैर तत्काल विरामावस्था में आ जाता है, किन्तु शरीर के शेष भाग गति के जड़त्व के कारण गत्यावस्था में ही रहते हैं। अतः व्यक्ति आगे की ओर गिर जाता है।
(iv) लम्बी कूद का खिलाड़ी कूदने के पहले कुछ दूरी से दौड़ते हुए आता है। कूदने के पहले दौड़ने से खिलाड़ी का पूरा शरीर गत्यावस्था में आ जाता है। अतः गति के जड़त्व के कारण उसे अधिक दूरी तक कूदने में आसानी होती है।
(3) दिशा का जड़त्व (Inertia of direction ) - किसी वस्तु के उस गुण को जिसके कारण वह स्वतः ही अपनी गति की दिशा में परिवर्तन करने में असमर्थ होती है, उसकी दिशा का जड़त्व कहते हैं ।
उदाहरण–(i) जब कोई बस वृत्तीय पथ पर मुड़ती है तो उसमें बैठा यात्री पथ के केन्द्र के बाहर की ओर एक बल का अनुभव करता है। इसका कारण यह है कि मोड़ पर बस तो मुड़ जाती है, किन्तु यात्री के शरीर का ऊपरी भाग दिशा के जड़त्व के कारण उसी दिशा में गतिमान रहता है। अतः उसे केन्द्र के बाहर की ओर एक बल का अनुभव होता है।
(ii) यदि रस्सी के एक सिरे पर पत्थर बाँधकर उसे क्षैतिज वृत्त में घुमाया जाए, तत्पश्चात् रस्सी को काट दिया जाए तो पत्थर स्पर्श रेखा की दिशा में दूर चला जाता है। वृत्तीय मार्ग के किसी बिन्दु पर वेग की दिशा उस बिन्दु पर स्पर्श रेखा की दिशा में होती है। अतः रस्सी को काट देने पर पत्थर दिशा के जड़त्व के कारण स्पर्श रेखा के अनुदिश दूर चला जाता है।